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Thursday, 10 March 2016

कृतज्ञता ....



कृतज्ञता ....

  देहरादून से प्रकाशित साप्ताहिक पत्र , न्यू एनर्जी स्टेट, परिवार का कृतज्ञ हूँ । साथ ही मेरे आलेख " अथ श्री यमुना कथा ! या व्यथा !! " भाग - एक के बाद भाग दो को भी ज्यों का त्यों अपने संपादकीय कॅालम में स्थान देने योग्य मूल्यांकित करने हेतु संपादक श्री गणेश प्रसाद जुयाल जी का विशेष आभारी हूँ।

Friday, 4 March 2016

धन्यवाद ज्ञापन



धन्यवाद ज्ञापन

        परसों, 2 मार्च को यमुना प्रदूषण पर भाग-एक के अंतर्गत, “अथ श्री यमुना कथा ! या व्यथा !!” शीर्षक के अंतर्गत पोस्ट किया था, जिसे देहरादून से प्रकाशित साप्ताहिक पत्र, New Energy State के संपादक श्री गणेश प्रसाद जुयाल जी ने ज्यों का त्यों अपने पत्र में संपादकीय कॉलम के अंतर्गत प्रकशित करने योग्य समझा, साथ ही अपनी सम्पादकीय कलम से मेरे प्रति जो उदगार व्यक्त किये उससे अभिभूत हूँ. ज्ञातव्य है कि संपादक श्री जुयाल जी 1992-93 में मेरे छात्र रह चुके हैं, और लगन, ईमानदारी व परिश्रम से पत्रकारिता में संलग्न हैं. लम्बे समय के बाद फेसबुक पर ही उनसे मुलाकात हुई थी. आलेख प्रकाशन हेतु New Energy State परिवार व श्री जुयाल जी का हार्दिक धन्यवाद करते हुए यह भी कहना चाहूँगा, साथ  ही पाठक गानों का भी हार्दिक धन्यवाद

Thursday, 7 January 2016

भारत का राष्ट्र निर्माता !!!




भारत का राष्ट्र निर्माता !!!

       ये फेंसी ड्रेस शो नहीं !! ये निगम शिक्षकों को तीन माह से वेतन न मिलने के कारण पूर्वी दिल्ली नगर निगम मुख्यालय के सामने धरने पर सार्वजानिक रूप से दिल्ली के हर निगम के उपेक्षित शिक्षक का आत्मिक दर्द, व्यथा व भावनाओं का शालीन प्रदर्शन है !!
      हमारे देश में विभिन्न समारोहों पर शिक्षक को " राष्ट्र निर्माता " और न जाने किन-किन उपमाओं से "विभूषित" करके उसे मर्यादाओं और शिष्टता की बेड़ियों में इस कदर जकड दिया जाता है कि न वो अपना दर्द बयां कर सकता है न अशिष्ट भाषा का प्रयोग कर उग्र हो सकता है !! लेकिन शालीन भाषा कोई सुनता नहीं !! हर कोई उसे मर्यादा का पाठ पढ़ाना चाहता है !!
     शिक्षक किसी दूसरे ग्रह का प्राणी नहीं !! वो भी देश का नागरिक है उसकी भी अपनी भावनाएं हैं ..समस्याएँ हैं.. आखिर वो अपनी बात रखे ! तो रखे कैसे ! और किसके सामने रखे ! .. देश की राजधानी में होते हुए भी कोई उसके दर्द को सुनने को राजी ही नहीं !! और जो सुनते हैं उनको पता है मर्यादित शिक्षक एक सीमा तक ही विरोध जता सकता है .. सड़कों पर कूड़े का ढेर नहीं लगाएगा न गाली गलौच करेगा न स्कूल ही बंद करेगा .. इसलिए वे माँ शारदे के उपासक की व्यथा सुनकर भी अनसुना कर देते हैं !!
       हम तरक्की के लिए जिन देशों का उदाहरण देते हैं उन देशों के बजट में शिक्षा को दिए जाने वाले हिस्से, शिक्षा के आधारभूत ढाँचे को को दी जाने वाली प्राथमिकता को हम कभी चर्चा का विषय नहीं बनाते !! हम केवल शिक्षक में कमी निकालकर अपने दायित्वों की इतिश्री समझ लेते हैं !
      राजधानी का शिक्षक तीन माह से वेतन के लिए संघर्ष कर रहा है दर-दर पर वेतन के लिए मिन्नत कर रहा है !! क्या इससे उसके आत्मसम्मान व स्वाभिमान पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़ रहा ?? महानगर में अर्थ बिना एक दिन में ही व्यक्ति स्वयं को असुरक्षित समझने लगता है .. मानसिक तनाव से पीडित हो जाता है क्या ये सब बातें शिक्षक के अध्यापन गुणवत्ता को प्रभावित नहीं करती ??
       मगर हमारे नीति नियंता किन्हीं अन्य विषयों में व्यस्त हैं .. उनके पास शिक्षक की समस्या के लिए वक्त नहीं ... तात्कालिक लाभ प्राप्ति के उद्देश्य से केवल उद्योग व उद्योगपतियों को बढ़ावा देने को लेकर ही संजीदा हैं !!
       ये देश का दुर्भाग्य ही कहूँगा कि शिक्षा को हम केवल व्ययकारी व अलाभकारी उपक्रम समझते हैं !! हम पडोसी देश पर विपत्ति आने पर दौड़ कर मदद करके राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय छवि बनाना चाहते हैं.. कोई " मन " की बात करता है कोई " मस्तिष्क " की बात !! लेकिन नाक के नीचे अपने ही देश के बेहाल शिक्षक का हाल पूछने में अपने पद की तौहीन समझते हैं !!
       लोकतंत्र के तथाकथित चौथे स्तम्भ इलेक्ट्रोनिक मीडिया को इस समस्या में कोई " ग्लैमर " नहीं दीखता या उसका मुंह बंद कर दिया गया है !! शायद मीडिया इस समस्या को खबर तब बनाएगा जब शिक्षक आत्मघाती कदम उठा चुका होगा !! शायद तब उसे समस्या में " ग्लैमर " नजर आ जाए !! और टेलीविजन पर फिर शुरू होगी तथाकथित "अर्थ शास्त्रियों " व " विद्वानों " की जुगाली !!
        लिखते-लिखते एक किस्सा याद आया !! .. छठे दशक की बात है एक कार्यक्रम में नोबेल पुरस्कार विजेता और इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री सर विस्टन चर्चिल समय से उपस्थित हो गए .. फिर भी कार्यक्रम काफी देर के बाद प्रारंभ हुआ !! कारण !! उनके पूर्व अध्यापक को आने में देर हो गयी थी ... !! प्रधानमंत्री चर्चिल ने जैसे ही चलने में असहजता महसूस कर रहे वृद्ध गुरु को आते देखा.. दौड़कर भीड़ के बीच जाकर गुरु को सहारा देकर मंच पर लाये और अपनी बगल में बिठाया ! फिर कार्यक्रम प्रारंभ हुआ !!
       लेकिन भारत में !!! जय हो " राष्ट्र निर्माता " की .... जय हो !! माँ शारदे के " पुजारी " की !!!


Tuesday, 8 December 2015

हमारा हरा-भरा विद्यालय



हमारा हरा-भरा विद्यालय

नित नूतन जीवन..
स्फूर्ति तन मे पाता हूँ,
रोज प्रात मतवाले उपवन में
खुद से ही मिल पाता हूँ,
बीत गया जो बचपन मेरा
उसका दीदार कर पाता हूँ
कल्पना सागर में नित गोते
विद्या उपवन में लगाता हूँ,
मूर्त रूप पाने की चाह में
कुछ नव सृजन पुष्प उगाता हूँ.

  विजय जयाड़ा
 

Thursday, 3 December 2015

जज्बातों के सैलाब में अक्सर अल्फ़ाज़ बह जाते हैं



जज्बातों के सैलाब में अक्सर अल्फ़ाज़ बह जाते हैं
होंठ बुदबुदाते हैं मगर स्वर कुंद पड़ जाते हैं,
कहने की जिद में भूल हो तो जज्बातों को सजा देना
आपका साथी हूँ साथियों, मुझे माफ कर देना ..

... विजय जयाड़ा

        साथी अध्यापिका श्रीमती शीला देवी जी के सेवानिवृत्ति सम्मान कार्यक्रम में प्रधानाचार्या श्रीमती कमलेश जी द्वारा सौंपी गई मंच संचालन की कठिन जिम्मेदारी की शुरुआत इस शेर से की !!
       मैं स्वयं भी भावुक प्रकृति का हूँ और विदाई के भावनात्मक माहौल में मंच संचालन विधा से मैं कितना न्याय कर पाया, ये तो कार्यक्रम में उपस्थित अतिथिगण ही ज्यादा बेहतर बता सकेंगे लेकिन आज मैं आत्मविश्वास बटोरने में सफल अवश्य रहा।

        कलाम साहब ने कहा है .. उत्कृष्ठता, आकस्मिक घटना नहीं !! निरंतर कार्य करते रहने से उत्कृष्ठता प्राप्त होती है.
          तस्वीर की पृष्ठभूमि में श्यामपट्ट सज्जा पर भी मैनें ही हाथ आजमाए हैं।


Thursday, 12 November 2015

संस्कृति से जुड़ा प्राचीन वाद्य : मृदंग



संस्कृति से जुड़ा प्राचीन वाद्य : मृदंग

       पांच वर्ष पूर्व, दस दिन की उड़ीसा घुमक्कड़ी के दौरान संस्कृति समृद्ध उड़ीसा के सादगी परिपूर्ण जन-जीवन, ऐतिहासिक व धार्मिक स्थलों से काफी करीब से रूबरू होने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ था.
       कल दीपावली के अवसर पर, कॉलोनी में उड़ीसा निवासी, बहुत पुराने मित्र कपिल राय जी, मृदंग गले में डालकर कर गीत-संगीत का माहौल बनाने को ही थे कि मैं उनके घर पहुँच गया. मृदंग की सज्जा देखकर आकर्षित हुआ !! तो उत्सुकता में कपिल जी से मृदंग लेकर अपने गले में डाल कर अनाड़ी स्टाइल में थाप देने को ही था कि कपिल जी ने रोका !
          “ भाई साहब ! ऐसे नहीं !! मृदंग पर थाप देने के कुछ नियम हैं, अकेले बाएं हाथ से थाप देने पर, ब्रह्म हत्या और अकेले दायें हाथ से थाप देने पर गौ हत्या मानी जाती है ! “ और दोनों हथेलियों से एक साथ मृदंग पर एक साथ थाप देते हुए मस्त अंदाज में बोले, “दोनों हाथों से एक साथ थाप देकर ...ऐसे बजाइए !!
           कपिल जी की बात सुनकर सोचने लगा ! ये वर्जनाएं संभवत: संगीत में फूहड़ता रोकने और संगीत की मर्यादा व शालीनता बनाये रखने के उद्देश्य से धर्म से जोड़कर लगायी गयी होंगी !!
           मृदंग, ढोलक की तरह का ही थाप वाद्य है जो दक्षिण भारत में प्राचीन काल से प्रचलित है लकड़ी के खोल पर चमड़े की थाप से मढ़े जाने वाले मृदंग के एक सिरे की गोलाई दूसरी सिरे से कम होती है. चैतन्य महाप्रभु ने दोनों शिष्यों के साथ मिलकर मृदंग, झांझ, मजीरे आदि की ताल पर भक्ति की एक नयी धारा बहायी.
         अमीर खुसरो ने मृदंग को काटकर ही तबला बनाया था.. जिसका आधुनिक संगीत में वाद्य के रूप में हर जगह उपयोग किया जाता है.   

           हर विधा के कुछ नियम होते हैं और एक अनुशासन होता है. उनको अंतर्मन से अनुसरित करने पर ही साधना की सफलता सुनिश्चित है तत्पश्चात ही सम्बंधित विधा में नए आयाम स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त हो पाता है..