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Thursday, 10 March 2016

अथ श्री यमुना कथा ! या व्यथा !! .. एक विवेचना .: भाग - एक




अथ श्री यमुना कथा ! या व्यथा !! .. 

एक विवेचना .: भाग - एक

          आज DND (  दिल्ली – नोएडा ) फलाई ओवर के ऊपर से गुजर रहा था. मन हुआ यमुना नदी की पृष्ठभूमि में एक तस्वीर क्लिक की जाय ! बाइक रोकी .. पुल के नीचे जल राशि पर नजर डाली तो विश्वास नहीं हुआ कि ये यमुना नदी है ! सोचा ! शायद, बरसात में जमुना खादर के किसी कुंड में इकठ्ठा हुआ पानी है जो कई महीनों तक इकठ्ठा रहने के कारण काला कीचड़ बन गया है !! तभी पुल पर लगा एक सुन्दर सा बोर्ड दिखा जिस पर लिखा था .... 
                                   “ मेरी दिल्ली.. मेरी जमुना .. गन्दगी हटाओ .. जमुना बचाओ “
.....अब पूर्ण विश्वास हो गया कि ये यमुना नदी ही है !!
           यमुना नदी की बात चले और चिर-परिचित, श्री कृष्ण द्वारा कालिय नाग मर्दन प्रसंग का जिक्र न हो तो शायद बात अधूरी ही रह जायेगी !! प्रसंग से तो आप अच्छी तरह विज्ञ हैं लेकिन मैं इस प्रसंग की पूर्व क्षमा सहित वर्तमान सन्दर्भ में विवेचना अवश्य करना चाहूँगा .....
            रमण द्वीप निवासी पन्नग वंशी और कद्रू का पुत्र कालिय द्वापर युग में कोई बाहुबली भू माफिया ही रहा होगा, अतिक्रमण और प्रदूषण फ़ैलाने की प्रवृत्ति के कारण ही प्रचलित प्रसंग में उसे प्रतीक रूप में नाग के रूप में प्रस्तुत किया गया होगा. रमण पर्वत पर पर्यावरण विपरीत कार्यों के चलते जब वहां के राजा गरुड़, कालिय पर क्रोधित हुए तो कालिय नाग अपनी जान बचाने के लिए अपने गैंग के साथ यमुना के किनारे सुनसान खादर क्षेत्र में आकर रहने लगा. लेकिन उसने अपनी मूल प्रवृत्ति को यहाँ आकर भी नहीं त्यागा !!
            कालिय ने अपने गैंग के साथ मिलकर आस पास के लोगों में भय उत्पन्न कर यमुना खादर में अतिक्रमण करके और पर्यावरण विपरीत कृत्यों से जमुना खादर जल कुंडों में इतना अधिक रासायनिक प्रदूषण फैलाया की उन कुंडों का जल अति विषाक्त हो गया जो रासायनिक क्रियाओं के कारण गर्म होकर खौलता रहता था. इस कारण क्षेत्र की जैव विविधता नष्ट होने लगी और जल पीने वाले पक्षी और पशुधन मृत्यु को प्राप्त होने लगा ..
                  उस काल में पशु धन को सबसे अधिक महत्व दिया जाता था. कालिय के कुकृत्यों के कारण जब जन जीवन बहुत अधिक प्रभावित होने लगा तो श्री कृष्ण ने क्रोधित होकर इस बाहुबली भू माफिया कालिय का मर्दन करके स्थानीय लोगों को राहत दिलाई तथा यमुना क्षेत्र के पर्यावरण को प्रदूषण मुक्त किया ..
                आज के सन्दर्भ में सोचता हूँ कि आज कलयुग में कालिय की वंश वृद्धि बहुत बहुत तेजी से हुई है ! एकाधिक कालिय और उनके गैंग साथियों को पकड़ने के लिए एक नहीं बल्कि कई कृष्ण तैनात किये गए हैं !! और इस कार्य के लिए उनको अच्छा खासा वेतन भी दिया जाता है लेकिन लगता है कलयुगी कृष्णों ने कालिय से मिलीभगत कर गठबंधन बना लिया है !!

               जब खेत की बाड़ ही खेत को खाने लगे तो भला खेत को कौन बचा सकता है !! यमुना किंकर्तव्यविमूढ़ है !! हम कलियुगी पुत्र उसको समय-समय पर धमकाते रहते हैं !! साथ ही सुबह-सुबह ये मन्त्र उच्चारित कर स्वयं को नदियों के प्रति आस्थावान होने का भी खूब " प्रदर्शन " करते हैं .. लेकिन शायद !! ये मन्त्र हम नदियों के प्रति आस्था भाव से नहीं बल्कि उन पर धौंस जमाते हुए आज्ञा भाव में उच्चारित करते हैं !! 

                                       " गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति ।
                                    नर्मदे सिंधु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु.. "

                              लेकिन “ पुत्रो कुपुत्रो जायते माता कुमाता न भवति” 
              यमुना आज भी निश्छल भाव में हम छली पुत्रों की प्यास बुझा रही है ! शांत प्रवाहमय है !!
मन में प्रश्न उठा !! कि क्या कलयुग में फिर श्री कृष्ण के अवतरित होने तक यमुना यूँ ही विषाक्त होती रहेगी ? या यमुना को माँ का दर्जा देने वाले हम पुत्रों को माँ यमुना के निरंतर मैले कुचैले होते आंचल को साफ़ रखने में आत्मा की आवाज़ पर आगे बढ़कर योगदान देना होगा ?


DND (  दिल्ली – नोएडा ) फ्लाई ओवर से यमुना का दृश्य

यमुना जल !! 
जय हो यमुना मैया !!
हम सबने मिलकर क्या हाल कर दिया है यमुना का !!


ऋषिकेश के पास गंगा नदी का स्वच्छ जल.. 
जब यमुना उत्तराखंड क्षेत्र में बहती है तो बिलकुल ऐसा ही स्वच्छ जल यमुना नदी का भी दिखाई देता है .. क्या कभी मैदानी क्षेत्र में ये दोनों नदियाँ इतनी ही स्वच्छ दिख पाएंगी

नक्कार खाने में तूती !! "संग्रहालयों व स्मारकों में थूकना सख्त मना है।"




नक्कार खाने में तूती !!

"संग्रहालयों व स्मारकों में थूकना सख्त मना है।"

      विश्व धरोहरों के प्रति, प्रतिदिन आने वाले हजारों स्वदेशी पर्यटकों की संजीदगी व रुझान का अनुमान आर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ़ इण्डिया द्वारा हाल ही में लगायी गयी तथा हिंदी में लिखी .. " संग्रहालयों व स्मारकों में थूकना सख्त मना है " निषेधात्मक चेतावनी पट्टिकाएं, बखूबी बयाँ करती हैं !! साथ ही ये पट्टिकाएँ विदेशियों के सामने हमारे सार्वजनिक स्वच्छता संस्कारों की पोल खोलती भी दिखाई देती हैं !
केवल थूकना ही परेशानी का सबब नहीं !! इन धरोहरों पर " पढ़े-लिखे " पर्यटकों द्वारा भविष्य में यहाँ आने वाले पर्यटकों को स्वयं का स्मरण दिलाने के लिए धरोहरों पर बहुत कुछ " चिर स्थायी " अंकन भी कर दिया जाता है !!
        ये निषेधात्मक पट्टिका लाल किला, नक्कार खाने पर लगी है. शायद स्वच्छता की बात करना भारत में नक्कार खाने में तूती की सी आवाज है !! इसी कारण कुछ साल पहले धरोहरों के जिन भागों को हम करीब से देखकर अनुभूत कर सकते थे ! अब उनके बहुत करीब जाना निषिद्ध कर दिया गया है!!
सोचता हूँ विदेशियों के मुकाबले हम बहुत तेजी से " तरक्की " कर रहे हैं !!
       सार्वजनिक स्वच्छता, राज्य का दायित्व अवश्य है मगर बच्चों में बचपन से ही व्यक्तिगत व सार्वजनिक स्वच्छता अनुशासन संस्कार स्थापित करना माता-पिता, अभिभावकों व शिक्षकों का राष्ट्रीय कर्तव्य भी है। केवल भारत माता की जय के जयकारों से ही देश की चहुंमुखी प्रगति सुनिश्चित नहीं हो सकती बल्कि मनसा-वाचा-कर्मणा, सुचिता अपनाकर देश की सांस्कृतिक, सामाजिक व आर्थिक प्रगति सुनिश्चित हो सकती है।

बाल-बलिदानी व शौर्य गाथा दीर्घा : लाल किला









बाल-बलिदानी व शौर्य गाथा दीर्घा
लाल किला : दिल्ली

उम्र के उस दौर में हम
  खुश होते थे खिलौनों से खेल कर !
सीने पे खायी गोलियां और
     चूम लिया फंदा ! उन्होंने ___
   सरफरोशी की तमन्ना कह कर !!
.. ..विजय जयाड़ा
 
       लाल किला भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का मूक लेकिन चश्मदीद गवाह है. जब भी यहाँ पहुँचता हूँ हर बार कुछ नया मिल जाता है ! ब्रिटिश काल में भारत मां की आजादी हेतु कई ज्ञात-अज्ञात और हर उम्र के लोगों ने देशप्रेम की बलिवेदी पर अपना सब कुछ न्यौछावर किया. इनमें कई मासूम बच्चे भी थे ! लेकिन दुर्भाग्य ! उनकी कुर्बानियों से कवि, लेखकों, इतिहासकारों की कलम अछूती ही रही !! आज भी हम राष्ट्रीय पर्वों पर इन बाल बलिदानियों को यथोचित रूप में याद नहीं करते !
          ये बाल शूरवीर, डॉक्टर, इंजीनियर, कवि, लेखक, उद्योगपति या व्यापारी बनकर भी सुखमय जीवन जी सकते थे लेकिन इन मासूमों ने मातृभूमि के लिए बलिदान मांगने वाला पथ चुना !
           पिछले दिनों भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने लाल किले के स्वतंत्रता संग्राम संग्रहालय में शहीद स्मृति चेतना समिति द्वारा गहन शोध उपरांत उपलब्ध कराये गए, 7-8 से लेकर 20 वर्ष तक के बाल बलिदानियों की गाथाओं और 101 दुर्लभ मूल चित्रों के आधार पर हस्तनिर्मित चित्रों से सज्जित गैलरी का लोकार्पण कर इन गुमनाम बाल बलिदानियों को उचित सम्मान और पहचान देने की स्वागत योग्य पहल की है.
           ऐसे 440 से अधिक बाल-बलिदानी जिनके चित्र उपलब्ध नहीं हो सके उनका राज्यवार परिचय दीर्घा के अंत में प्रदर्शित किया गया है. सभी हस्तनिर्मित चित्रों के चित्रकार श्री गुरुदर्शन सिंह ‘ बिंकल ‘ हैं. इस गैलरी में बाल बलिदानियों की तस्वीरें और शौर्य गाथाएं तो रोमांचित करती ही हैं साथ ही चित्रकार ‘बिंकल‘ साहब द्वारा स्वयं के रक्त से बनाये गए 28 बाल बलिदानियों के हस्त निर्मित चित्र कौतुहल और चित्रकार की देशप्रेम से ओतप्रोत भावना से परिचय भी करवाते हैं..
              चित्रकार 'बिंकल' साहब स्वयं की भावना व्यक्त करते हुए लिखते हैं कि राष्ट्र की बलिवेदी पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले ये बाल बलिदानी मेरे लिए देव तुल्य हैं. अत; ऐसे देव तुल्य बाल-बलिदानियों के चित्रों का अपने रक्त से श्रृंगार कर मैं स्वयं को धन्य समझता हूँ....
             सोचता हूँ कि जिला स्तर भी पर इस तरह की गैलरियां बनायीं जानी चाहिए और इन गैलरियों में छात्रों को शैक्षिक भ्रमण के अंतर्गत लाया जाना चाहिए, साथ ही बाल बलिदानियों को स्कूली पाठ्यक्रम में भी स्थान दिया जाना चाहिए। जिससे जापान और ऑस्ट्रेलिया की तरह भारत में भी बाल्यकाल से ही बच्चों में बचपन से ही देश प्रेम के संस्कार विकसित हो सकें..
             गैलरी में छायांकन निषिद्ध है लेकिन देशप्रेम की शौर्य गाथाओं व तस्वीरों से ओतप्रोत इस गैलरी से अधिक से अधिक लोग परिचित हो सकें. इस मन: स्थिति में बिना फ्लैश के छायांकन करने से स्वयं को न रोक सका.. इस दृष्टता हेतु सम्बंधित अधिकारियों से क्षमा प्रार्थी हूँ..
           जब भी लाल किला आइयेगा तो लाल किले में प्रवेश उपरांत छत्ता बाजार पार करते ही नौबत खाने से पहले ही बाएं मुड़कर एक बैरक को छोड़ अगली बैरक में पर्यटकों के आकर्षण से वंचित, स्वतंत्रता संग्राम संग्रहालय में बाल-बलिदानी गैलरी में इन बाल-बलिदानियों के जज्बे और देशप्रेम को अवश्य अनुभूत कीजियेगा..


कृतज्ञता ....



कृतज्ञता ....

  देहरादून से प्रकाशित साप्ताहिक पत्र , न्यू एनर्जी स्टेट, परिवार का कृतज्ञ हूँ । साथ ही मेरे आलेख " अथ श्री यमुना कथा ! या व्यथा !! " भाग - एक के बाद भाग दो को भी ज्यों का त्यों अपने संपादकीय कॅालम में स्थान देने योग्य मूल्यांकित करने हेतु संपादक श्री गणेश प्रसाद जुयाल जी का विशेष आभारी हूँ।

Friday, 4 March 2016

धन्यवाद ज्ञापन



धन्यवाद ज्ञापन

        परसों, 2 मार्च को यमुना प्रदूषण पर भाग-एक के अंतर्गत, “अथ श्री यमुना कथा ! या व्यथा !!” शीर्षक के अंतर्गत पोस्ट किया था, जिसे देहरादून से प्रकाशित साप्ताहिक पत्र, New Energy State के संपादक श्री गणेश प्रसाद जुयाल जी ने ज्यों का त्यों अपने पत्र में संपादकीय कॉलम के अंतर्गत प्रकशित करने योग्य समझा, साथ ही अपनी सम्पादकीय कलम से मेरे प्रति जो उदगार व्यक्त किये उससे अभिभूत हूँ. ज्ञातव्य है कि संपादक श्री जुयाल जी 1992-93 में मेरे छात्र रह चुके हैं, और लगन, ईमानदारी व परिश्रम से पत्रकारिता में संलग्न हैं. लम्बे समय के बाद फेसबुक पर ही उनसे मुलाकात हुई थी. आलेख प्रकाशन हेतु New Energy State परिवार व श्री जुयाल जी का हार्दिक धन्यवाद करते हुए यह भी कहना चाहूँगा, साथ  ही पाठक गानों का भी हार्दिक धन्यवाद

Thursday, 7 January 2016

भारत का राष्ट्र निर्माता !!!




भारत का राष्ट्र निर्माता !!!

       ये फेंसी ड्रेस शो नहीं !! ये निगम शिक्षकों को तीन माह से वेतन न मिलने के कारण पूर्वी दिल्ली नगर निगम मुख्यालय के सामने धरने पर सार्वजानिक रूप से दिल्ली के हर निगम के उपेक्षित शिक्षक का आत्मिक दर्द, व्यथा व भावनाओं का शालीन प्रदर्शन है !!
      हमारे देश में विभिन्न समारोहों पर शिक्षक को " राष्ट्र निर्माता " और न जाने किन-किन उपमाओं से "विभूषित" करके उसे मर्यादाओं और शिष्टता की बेड़ियों में इस कदर जकड दिया जाता है कि न वो अपना दर्द बयां कर सकता है न अशिष्ट भाषा का प्रयोग कर उग्र हो सकता है !! लेकिन शालीन भाषा कोई सुनता नहीं !! हर कोई उसे मर्यादा का पाठ पढ़ाना चाहता है !!
     शिक्षक किसी दूसरे ग्रह का प्राणी नहीं !! वो भी देश का नागरिक है उसकी भी अपनी भावनाएं हैं ..समस्याएँ हैं.. आखिर वो अपनी बात रखे ! तो रखे कैसे ! और किसके सामने रखे ! .. देश की राजधानी में होते हुए भी कोई उसके दर्द को सुनने को राजी ही नहीं !! और जो सुनते हैं उनको पता है मर्यादित शिक्षक एक सीमा तक ही विरोध जता सकता है .. सड़कों पर कूड़े का ढेर नहीं लगाएगा न गाली गलौच करेगा न स्कूल ही बंद करेगा .. इसलिए वे माँ शारदे के उपासक की व्यथा सुनकर भी अनसुना कर देते हैं !!
       हम तरक्की के लिए जिन देशों का उदाहरण देते हैं उन देशों के बजट में शिक्षा को दिए जाने वाले हिस्से, शिक्षा के आधारभूत ढाँचे को को दी जाने वाली प्राथमिकता को हम कभी चर्चा का विषय नहीं बनाते !! हम केवल शिक्षक में कमी निकालकर अपने दायित्वों की इतिश्री समझ लेते हैं !
      राजधानी का शिक्षक तीन माह से वेतन के लिए संघर्ष कर रहा है दर-दर पर वेतन के लिए मिन्नत कर रहा है !! क्या इससे उसके आत्मसम्मान व स्वाभिमान पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़ रहा ?? महानगर में अर्थ बिना एक दिन में ही व्यक्ति स्वयं को असुरक्षित समझने लगता है .. मानसिक तनाव से पीडित हो जाता है क्या ये सब बातें शिक्षक के अध्यापन गुणवत्ता को प्रभावित नहीं करती ??
       मगर हमारे नीति नियंता किन्हीं अन्य विषयों में व्यस्त हैं .. उनके पास शिक्षक की समस्या के लिए वक्त नहीं ... तात्कालिक लाभ प्राप्ति के उद्देश्य से केवल उद्योग व उद्योगपतियों को बढ़ावा देने को लेकर ही संजीदा हैं !!
       ये देश का दुर्भाग्य ही कहूँगा कि शिक्षा को हम केवल व्ययकारी व अलाभकारी उपक्रम समझते हैं !! हम पडोसी देश पर विपत्ति आने पर दौड़ कर मदद करके राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय छवि बनाना चाहते हैं.. कोई " मन " की बात करता है कोई " मस्तिष्क " की बात !! लेकिन नाक के नीचे अपने ही देश के बेहाल शिक्षक का हाल पूछने में अपने पद की तौहीन समझते हैं !!
       लोकतंत्र के तथाकथित चौथे स्तम्भ इलेक्ट्रोनिक मीडिया को इस समस्या में कोई " ग्लैमर " नहीं दीखता या उसका मुंह बंद कर दिया गया है !! शायद मीडिया इस समस्या को खबर तब बनाएगा जब शिक्षक आत्मघाती कदम उठा चुका होगा !! शायद तब उसे समस्या में " ग्लैमर " नजर आ जाए !! और टेलीविजन पर फिर शुरू होगी तथाकथित "अर्थ शास्त्रियों " व " विद्वानों " की जुगाली !!
        लिखते-लिखते एक किस्सा याद आया !! .. छठे दशक की बात है एक कार्यक्रम में नोबेल पुरस्कार विजेता और इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री सर विस्टन चर्चिल समय से उपस्थित हो गए .. फिर भी कार्यक्रम काफी देर के बाद प्रारंभ हुआ !! कारण !! उनके पूर्व अध्यापक को आने में देर हो गयी थी ... !! प्रधानमंत्री चर्चिल ने जैसे ही चलने में असहजता महसूस कर रहे वृद्ध गुरु को आते देखा.. दौड़कर भीड़ के बीच जाकर गुरु को सहारा देकर मंच पर लाये और अपनी बगल में बिठाया ! फिर कार्यक्रम प्रारंभ हुआ !!
       लेकिन भारत में !!! जय हो " राष्ट्र निर्माता " की .... जय हो !! माँ शारदे के " पुजारी " की !!!