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Wednesday, 30 March 2016

विद्यालय, संस्कार मंदिर : एक विचार



विद्यालय, संस्कार मंदिर : एक विचार

घर पहुँचने से पहले,
नेक काम कर लिया जाए,
करने तो हैं काम बहुत...
चलो पहले प्यासे पौधों को
पानी पिला लिया जाए ..

......विजय जयाड़ा 
 
            “ बच्चों !! आज छुट्टी का वक़्त हो चला है, अब आप घर जायेंगे, इसलिए बचा हुआ पानी इन पौधों को दे दीजिये. आजकल गर्मियां बहुत हैं इस पानी से ये पौधे, कल तक ताजगी और ठंडक महसूस करते रहेंगे.”
                    बचपन से ही बच्चों में पेड़-पौधों और जंतुओं के प्रति प्रेम और सहिष्णुता का भाव जगाना आवश्यक है. इस कार्य में बिद्यालय का वातावरण महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. विद्यालय केवल किताबी ज्ञान प्रदान करने का या एकत्र सूचनाओं को सम्प्रेषण करने का संस्थान नही बल्कि अच्छे संस्कारों को प्रदान करने व संस्कारों को संवर्धित करने का मंदिर भी है जहाँ अलग-अलग पृष्ठभूमि के बच्चे एक ही स्थान पर प्रतिदिन अपने जीवन का महत्वपूर्ण समय गुजारते हैं. विभिन क्रिया-कलापों के माध्यम से बातों-बातों में, बच्चों में अच्छे संस्कारों का हस्तांतरण व पुष्टिकरण किया जा सकता है ...इस कार्य के लिए किसी विशेष कक्षा या पीरियड की आवश्यकता भी नही ..


खुदी को कर कर बुलंद इतना ..... !! सलाम .....प्रोफ़ेसर देसाई साहब




 

                                 खुदी को कर कर बुलंद इतना ..... !! 

                                            सलाम .....प्रोफ़ेसर देसाई साहब



                 हम बातें तो बहुत बड़ी-बड़ी कर लेते हैं, दूसरों के कार्यों पर खूब टीका-टिप्पणी कर लेते हैं ..लेकिन...!! स्वयं अपने परिवार तक ही सीमित रह जाते हैं !! . समाज में ऐसे कई प्रेरणादायी व्यक्तित्व हैं जो बिना प्रसिद्धि की चाह में सहज और सहृदय भाव से बिना शोर-गुल व दिखावे के ,समाज को नयी दिशा व दशा प्रदान कर रहे हैं, वे किसी सरकारी सहायता के मोहताज नहीं ..न ही उनको किसी से कोई शिकायत है .. कर्म और सेवा ही उनके जीवन का उद्देश्य है
               51 वर्षीय प्रो. संदीप देसाई, गरीब बच्चों के लिए एक गत्ते का डिब्बा लेकर 'भीख मांगकर' स्कूल बनवाते हैं। ट्रेन के डिब्बे में चढ़कर पहले मराठी में कहते हैं - 'विद्या दान सर्वश्रेष्ठ दान आहे। हा दान द्या आणि निर्धन बालकांची मदद करा।' फिर इसी बात को हिंदी और अंग्रेजी में दोहराते हैं ..
                  फिर विस्तार से कहते हैं , 'आप सब पढ़े-लिखे हैं। पढ़ाई का महत्व जानते हैं। पर बहुत से बच्चों के पास पढ़ने की सुविधा और साधन नहीं है। न ही कभी हो सकते हैं। उन्हें पढ़ने में आप मदद कर सकते हैं। आप समर्थ हैं सर, इसलिए आपको यह नेक काम करना ही चाहिए।'ये हैं प्रोफेसर संदीप देसाई। चमत्कृत कर देने वाली शैली में तीन-चार मिनट बोलकर, सबके आगे डिब्बा घुमाना शुरू कर देते हैं । एक रुपये के सिक्के से लेकर 100 रुपये के नोट तक उस डिब्बे में गिरने लगे। हर यात्री द्वारा डिब्बे में कुछ डालने के बाद देसाई अपनी दाईं हथेली अपने दिल पर रखकर थोड़ा झुकते और मुस्कराकर कहते, 'थैंक यू सर, गॉड ब्लैस यू.'दो स्टेशन के बाद वे फिर अगले डिब्बे में चढ़ जाते हैं । कुछ यात्री उनकी प्रशंसा के पुल बांधने लगते हैं । एक युवक कहता है , 'ये अंकल जब भी ट्रेन में मिलते हैं, तो मैं अपनी पॉकेट मनी से बचाये 50 रुपये इन्हें दे देता हूं।'
यात्रियों में कई प्रो.देसाई को जानते थे. वे गोरेगांव में रहते हैं। पेशे से इंजिनियर हैं। एस. पी. जैन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड रिसर्च में प्रोफेसर थे। 1997 में वहां से नौकरी छोड़कर अंग्रेजी माध्यम के एक स्कूल में पढ़ाने लगे। इसमें गोरेगांव की झोपड़ियों के बच्चे पढ़ते थे। वहां पढ़ाते हुए उन्हें महसूस हुआ कि ये बच्चे तो फिर भी पढ़ पा रहे हैं, कितने ही बच्चे पढ़ाई कर ही नहीं पाते। आसपास कोई स्कूल न होने के कारण। बस, उसी दिन से उन्होंने ऐसी जगहों पर स्कूल बनाने की ठान ली। रोजी के लिए ये इधर-उधर कुछ काम करते रहे। 2005 में उन्होंने झोपड़पट्टी के बच्चों के लिए 'श्लोक' स्कूल बनाया। फिर रत्नागिरी में गरीब ग्रामीण के लिए एक स्कूल बनाया। जब उसमें पैसे की कमी आयी, तो उन्होंने ट्रेन में भीख मांगना शरू कर दिया।
             वे छह घंटे गोरेगांव से चर्चगेट तक लोकल ट्रेन में सफर करके भीख मांगने लगे। इस तरह वे 3000 रुपये रोज इकट्ठे करने लगे। पांच महीने में उन्होंने चार लाख रुपये एकत्र कर लिए। अगले चार महीने में दूसरा स्कूल भी शुरू हो गया। देसाई वहीं नहीं रुके। उनकी योजना ऐसे दर्जनों स्कूल बनाने की है। इसलिए वे आज भी रोज ट्रेनों में भीख मांगते हैं। रोज जितना पैसा मिलता है, रात को उसका हिसाब लिखकर सोते हैं और अगली सुबह पैसा बैंक में जमा कर देते हैं। अभी उन्हें दर्जनों स्कूल जो बनवाने हैं।
               अभिनेता सलमान खान ने एक दिन ट्विटर पर प्रोफेसर देसाई को सलाम किया। फिर सलमान ने उन्हें फोन करके उनसे उनका बैंक एकाउंट नंबर लिया। उनसे वादा भी लिया कि मैं आपकी मदद करूंगा, पर आप किसी को बताना मत। इसलिए वे सलमान द्वारा दी गई रकम के बारे में नहीं बताते। दरअसल प्रो. देसाई की मां एक ग्रामीण स्कूल में अध्यापिका थीं। देसाई ने बचपन से देखा था कि किस तरह गरीब बच्चे पढ़ नहीं पाते। तभी उन्होंने ऐसे बच्चों के लिए कुछ करने का संकल्प किया था। वह संकल्प आज वे पूरे तन-मन-धन से निभा रहे हैं।ज्ञान की ज्योति ऐसे ही जलती है... आपके इस समर्पण युक्त ज़ज्बे को .. ... सलाम .....प्रो, देसाई साहब
 
 
 

Saturday, 19 March 2016

इजाजद हो गर नफरत की



इजाजद हो
गर नफरत की
  तो वो मजहब नहीं !
इंसानियत से भी
       जरूरी हो ___
   कोई मजहबी किताब नहीं !!

.. विजय जयाड़ा


हर लम्हा हसीन और खुशगवार होता है




हर लम्हा हसीन और खुशगवार होता है
    मासूम सा बचपन जब आसपास होता है !!
.. विजय जयाड़ा 

            इस वर्ष की बौद्धिक फसल तैयार है .. बस सत्रान्त में औपचारिक रूप से ये देखना बाकी है कि बौद्धिक फसल की हर बाली का कितना बौद्धिक विकास हो पाया है !!
            वर्तमान सत्र के पठन-पाठन व परीक्षाओं के दौर की औपचारिक समाप्ति का यादगार लम्हों से परिपूर्ण अंतिम दिन .. मेरी कक्षा, कक्षा-चतुर्थ के बच्चे ..


Sunday, 13 March 2016

अथ श्री यमुना कथा ! या व्यथा !! पर्यावरण पर एक मंथन : भाग - तीन



अथ श्री यमुना कथा ! या व्यथा !!

पर्यावरण पर एक मंथन : भाग - तीन

यह कदम्ब का पेड़ अगर होता यमुना तीरे
    मैं भी इस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे धीरे !!

        वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अगर देखा जाय तो दिल्ली में निष्प्राण व बेहाल यमुना को देखकर सुभद्रा कुमारी चौहान जी की ये पंक्तियाँ दुर्भाग्यवश अप्रासंगिक सी जान पड़ती हैं !!
         ये दृश्य गंगा नदी का है लेकिन सोचता हूँ क्या दिल्ली में यमुना इतनी ही निर्मल व स्वच्छ दिख सकेगी !! यमुना की इलाहबाद तक की कुल 1376 किमी. तक की यात्रा के दिल्ली में यात्रा के दौरान वजीराबाद से ओखला बैरेज तक 22 किमी. की दूरी का क्षेत्र का यमुना के कुल प्रदूषण में लगभग 79 % (साभार: इण्डिया वाटर पोर्टल) का हिस्सा है. यदि इस हिस्से को गन्दगी मुक्त करने की जिम्मेदारी, राजनीतिक पूर्वाग्रहों को त्यागकर, राज्यपाल, शहरी विकास, पर्यटन मंत्री रह चुके कुशल व सख्त प्रशासक श्री जगमोहन साहब को सौंप दी जाय तो निश्चित ही निष्प्राण यमुना फिर से प्राणवान हो सकती है (व्यक्तिगत विचार). इस क्रम में विभिन्न राजनीतिक दबावों के बावजूद भी अपने काम को निर्भीकता और कुशलता से अंजाम देने वालों में पूर्व चुनाव आयुक्त टी. एन. शेषन साहब व मेट्रो एम डी. श्रीधरन साहब भी उल्लेखनीय नाम हैं.
        दिलों में अपनी खूबसूरत पहचान खोती जा रही प्राकृतिक व सांस्कृतिक धरोहर, यमुना को पुनर्जीवित करने के निहितार्थ विभिन्न केंद्र सरकारों द्वारा अब तक किये गए प्रयासों में हजारों करोड़ रूपये यमुना में बहाए जा चुके हैं ! लेकिन यमुना की स्थिति बद से बदत्तर होती जा रही है !! इस कारण अब युद्ध स्तर पर प्रयास किये जाने आवश्यकता है. जिससे लन्दन की खूबसूरती बढ़ाती, टेम्स नदी की तरह यमुना भी दिल्ली की खूबसूरती में चार चाँद लगा सके और यमुना के गौरवमयी अतीत की वापसी सुनिश्चित हो सके.
         गंगा और यमुना को यदि परिदृश्य से हटा दिया जाय तो हमारी संस्कृति व कृषि निष्प्राण सी लगती है. सोचता हूँ दृढ राजनीतिक इच्छा शक्ति के आगे कुछ भी असंभव नहीं !! अकेले टेम्स ही नहीं दुनिया की कई नदियां ऐसे ही साफ़ की गईं हैं. जर्मनी में राइन, दक्षिण कोरिया में हान और अमरीका में मिलवॉकी नदियों को दृढ राजनीतिक इच्छा शक्ति के बल पर ही पुनर्जीवित किया जा सका है ..


Friday, 11 March 2016

निभाना भी धरम है ..





   > निभाना भी धरम है <

जीवन में अगर गम हैं
तो खुशियाँ भी कम नहीं
पथ में अगर शूल हैं
   फूलों की भी कमी नहीं ..

अंधेरों के बाद उजाले
   जब उसका ही करम है !
विश्वास है भगवान् पर
     तो निभाना भी धरम है ...
 ... विजय जयाड़ा

Thursday, 10 March 2016

अथ श्री यमुना कथा ! या व्यथा !! पर्यावरण पर एक मंथन : भाग - दो


अथ श्री यमुना कथा ! या व्यथा !!

पर्यावरण पर एक मंथन : भाग - दो

         नदियाँ, संस्कृति व समृद्धि का पर्याय ही नहीं बल्कि प्राकृतिक सौन्दर्य की पूरक भी हैं. लन्दन के बीचों-बीच बहकर शहर की खूबसूरती बढ़ाती टेम्स नदी भी कभी यमुना की तरह मृत होकर बीमारियों की जड़ बन चुकी थी. टेम्स नदी इतनी प्रदूषित हो गयी थी कि 1858 में इससे उठती भयंकर दुर्गन्ध के कारण संसद की कार्यवाही तक रोकनी पड़ी.. इसके बाद वहां की सरकार चेती और ईमानदारी से लगातार 50 वर्षों के सघन प्रयासों के उपरांत टेम्स पुन: अपने खूबसूरत स्वच्छ निर्मल रूप में आ सकी.
       अब मूल विषय पर चर्चा की जाय .. हिमालय के कालिंद शिखर से उद्गम से लेकर इलाहाबाद में गंगा में मिलने तक के यमुना के लगभग 1376 किमी. के सफ़र को पांच क्षेत्रों में बांटा गया है. इस सफ़र के अंतर्गत यमुना बहाव का सबसे छोटा व तृतीय क्षेत्र जो कि मात्र 22 किमी. का है दिल्ली महानगर के अंतर्गत आता है. यही क्षेत्र प्रदूषण की दृष्टि से यमुना के सफर में सबसे भयानक पड़ाव है जहाँ मैले नालों का पानी और कूड़ा-कचरा, कुल प्रदूषण में 79 % का हिस्सेदार बनकर, यमुना को सबसे अधिक विषैला करके उसे मृत घोषित करने को मजबूर कर देता है !! अकेले इस क्षेत्र में 22 गंदे नालों के जरिये प्रतिदिन लगभग 300 करोड़ ली. अपशिष्ट जल यमुना में छोड़ा जाता है. इसी कारण यमुना सफाई के लिए चलाया गया द्वितीय यमुना एक्शन प्लान केवल दिल्ली में यमुना की सफाई पर केन्द्रित किया गया था.
     दिल्ली, यमुना में केवल गन्दगी ही नहीं डाल रही है बल्कि यमुना के तटीय क्षेत्रों में अतिक्रमण करके, यमुना बैंक व शास्त्री पार्क मेट्रो स्टेशन अक्षरधाम मन्दिर, मिलेनियम बस डिपो, कॉमनवेल्थ खेल गाँव, इन्दिरा गाँधी इनडोर स्टेडियम सहित हजारों झुग्गी-झोपड़ियाँ भी बन गई है.
     DND पुल के पास यमुना खादर में “ आर्ट ऑफ़ लिविंग “ के सौजन्य से एक ताजा अस्थायी अतिक्रमण आजकल सुर्ख़ियों में है. 11 मार्च से 13 मार्च तक ध्वनि विस्तारक यंत्रों व तेज प्रकाश की पृष्ठभूमि में विश्व प्रेम और शान्ति का सन्देश के देने नाम पर श्री श्री रविशंकर और उनके अनुयायियों द्वारा आयोजित किये जा रहे विश्व सांस्कृतिक महोत्सव, का उद्घाटन भारत के प्रधानमंत्री और समापन माननीय राष्ट्रपति करेंगे. इस कार्यक्रम में शामिल होने वाले अनुमानित 35 लाख लोगों की व्यवस्था हेतु नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ((एनजीटी) के आदेशों का खुलम्म खुल्ला उल्लंघन करते हुए शांत यमुना खादर के एक बड़े भाग की प्राकृतिक भू स्थिति को अर्थ मूवर, जेनरेटर, जे सी वी, ट्रकों के उपयोग से रौंदकर और अशांत करके जैव विविधता को समाप्त कर स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र को ध्वस्त कर दिया गया है ! 

         आयोजन के माध्यम से प्रेम और शान्ति के सन्देश के देने के क्रम में न जाने कितने पशु-पक्षी और जीवों के प्राकृतिक आवास समाप्त हो जायेंगे और तेज प्रकाश व ध्वनि विस्तारक यंत्रों द्वारा उच्च आवृत्ति वाली ध्वनियों के उपयोग से किस हद तक क्षेत्र के बचे-खुचे जीव व पारिस्थितिक तंत्र प्रभावित होगा इसका अनुमान आप स्वयं ही लगा सकते हैं. ध्यान देने योग्य यह भी है कि जिन क्षेत्रों में आर्ट ऑफ़ लिविंग संगठन कार्य कर रहा है उनमे एक क्षेत्र “ पर्यावरण स्थिरता “ भी है !!
      हालांकि गठित प्रिंसिपल कमेटी ने NGT को जमा की गयी रिपोर्ट में कहा है कि आर्ट ऑफ़ लिविंग संगठन से कार्यक्रम प्रारंभ होने से पूर्व 120 करोड़ रुपये का क्षतिपूर्ति हर्जाना वसूला जाय और सम्बंधित क्षेत्र में पूर्ववत भौगोलिक पुनर्स्थापना भी सुनिश्चित की जाय ..
        अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत ! प्रदूषण नियंत्रण के लिए नियुक्त कलयुगी “ कृष्ण “.. दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण कमेटी और जिला आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण ने यदि कार्यक्रम के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र देते हुए इतनी जल्दबाजी न दिखाई होती तो ये स्थिति न आती ..
प्रश्न उठता है कि यदि हर्जाना वसूल भी लिया जाय तो क्या हम स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र को पुन: उसी रूप में स्थापित कर पायेंगे !! हम इसी लचर इच्छा शक्ति के बल पर दिल्ली में बहती यमुना को टेम्स की तरह खूबसूरत और स्वच्छ बना पायेंगे !! क्या हम इसी लचर इच्छा शक्ति के बल पर यमुना सफाई पर हजारों करोड़ रुपये व्यय करने के बाद भी हम मृत यमुना को टेम्स की तरह पुनर्जीवित कर इस प्राकृतिक धरोहर का गौरवशाली अतीत लौटा पायेंगे !!
विभिन्न यमुना एक्शन प्लान्स, जिनमें 2015 तक यमुना को पूर्णतया प्रदूषण मुक्त करने की कार्य योजना तय की गई थी के बाद यमुना की वर्तमान स्थिति देखकर सोचता हूँ ! जब टेम्स नदी की तरह यमुना की सडांध संसद तक पहुंचकर संसदीय कार्यवाही रोककर स्वयं को स्वच्छ करने को गरियाएगी ! शायद ही हमारे सफेदपोश राजनेताओं की नींद खुलेगी !!
         अंत में सोचता हूँ शायद !! प्रागैतिहासिक काल से निरंतर प्रेम - शांति - समृद्धि का सन्देश देती माँ यमुना को कलयुग में हमने अनियंत्रित " विकास " के कारण उस लायक अब नहीं रखा !! और अब माँ यमुना के स्थान पर हम स्वयं ही विश्व शांति और प्रेम का सन्देश देने इसके तट पर भव्य अतिक्रमण कर डेरा डाल कर पहुँच गए हैं ..

 

आयोजन की तैयारियों में जुटे अर्थ मूवर, जे सी वी,जेनरेटर

आयोजन हेतु समतल कर दिया गया खादर क्षेत्र 
आवाजाही के लिए निर्माणाधीन पन्टून पुल
आयोजन स्थल के पास से बहती मृतप्राय यमुना 
यमुना खादर 
कूड़े-कचरे और गंदे नालों के अपशिष्ट  ढोती यमुना 
DND फ्लाई ओवर पर लगाया गया बोर्ड