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Saturday, 2 April 2016

मेरा नया दोस्त ! ' गिल्लू '







मेरा नया दोस्त ! ' गिल्लू '

                   मन हुआ ! अपने नए नन्हे दोस्त गिल्लू से आपका परिचय करा दूँ...
           आज शाम को गिलहरी के इस बच्चे को घर के सामने घायलावस्था में कुत्तों से घिरा निरीह सा पाया !!
            
         सोचता हूँ..माँ से बिछुड़ चुकी इस छोटी सी घायल गिल्लू को माँ ममता सम वृहत स्नेह छाँव दे पाना शायद हमारे लिए संभव नहीं !! लेकिन अंजुली भर ममतामय स्नेह आलिंगन तो दे ही सकते हैं ..
अपने स्वाभाविक आवास से बिछुड़े इस बच्चे को देखकर कवि श्रेष्ठ श्री हरिवंश राय बच्चन साहब द्वारा रचित, बाल कविता " गिलहरी का घर " याद आ गयी .. महादेवी वर्मा जी की कहानी "गिल्लू" से तो आप अवश्य परिचित होंगे !!
 
एक गिलहरी एक पेड़ पर
बना रही है अपना घर,
देख-भाल कर उसने पाया
खाली है उसका कोटर ।
कभी इधर से, कभी उधर से
कुदक-फुदक घर-घर जाती,
चिथड़ा-गुदड़ा, सुतली, तागा
ले जाती जो कुछ पाती ।
ले जाती वह मुँह में दाबे
कोटर में रख-रख आती,
देख बड़ा सामान इकट्ठा
किलक-किलककर वह गाती ।
चिथड़े-गुदडे़, सुतली, धागे ---
सब को अन्दर फैलाकर,
काट कुतरकर एक बराबर
एक बनायेगी बिस्तर ।
फिर जब उसके बच्चे होंगे
उस पर उन्हें सुलायेगी ,
और उन्हीं के साथ लेटकर
लोरी उन्हें सुनायेगी
-हरिवंशराय बच्चन


Wednesday, 30 March 2016

पेशावर कांड









       

पेशावर कांड

             23 अप्रैल 1930, पेशावर कांड द्वारा इंसानियत को बुलंद करने वाले, उत्तराखंड, जनपद पौड़ी के हवलदार मेजर चन्द्र सिंह भंडारी, इंसानियत के महानायक, वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली के रूप में याद किये जाते हैं और भविष्य में भी श्रद्धा पूर्वक, प्रेरक व्यक्तित्व के रूप में याद किये जाते रहेंगे ..
              सीमान्त गाँधी, खान अब्दुल गफ्फार खान द्वारा सृजित खुदाई खिदमदगार के निहत्थे पठान कार्यकर्ता जब खिलाफत आन्दोलन के तहत पेशावर में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे ब्रिटिश सेना के अंतर्गत कार्य कर रही रॉयल गढ़वाल रायफल के अंग्रेजी कमांडर ने प्रदर्शनकारियों पर “ ओपन फायर “ का आदेश दिया लेकिन परिणाम को समझते हुए भी मातृभूमि के पुजारी चन्द्र सिंह भंडारी ने उनके आदेश की नजरअंदाज करते हुए आदेश दिया “ सीज फायर “ !!! रॉयल गढ़वाल रायफल के जवानों ने गोली चलाने से इनकार कर दिया.परिणाम स्वरुप सभी का कोर्ट मार्शल कर दिया गया . अलग-अलग तरह की सजाएँ भी दी गयी... लैंसडाउन से गए बैरिस्टर मुकंदी लाल की पैरवी के फलस्वरूप वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली को मृत्युदंड, की जगह आजन्म कारावास की सजा सुनाई गयी ..
      पिताजी पौड़ी में पूर्व सैनिकों के पुनर्वास को देखने वाले विभाग में कार्यरत थे तो वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली उनके ऑफिस में आया करते थे अत: मेरा भी उनसे साक्षात्कार हो जाता था !! आज प्रेरक व्यक्तित्व की तस्वीर स्वाभाविक रूप से मानस पटल पर श्रदापूर्वक उभर आई 
 
 
 

R T E क्विज़ प्रतियोगिता ( 31.03.15 )



           छात्र व शिक्षक की दिनचर्या लगभग समान ही होती है, दोनों को अध्ययन में निरंतरता रखने व सम-सामयिक जानकारी से विज्ञ होने के साथ-साथ उत्साही व कर्तव्यों के प्रति संजीदा होना आवश्यक है. इसी क्रम में प्रशासन द्वारा छात्र और अध्यापकों के लिए अलग-अलग प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं. वास्तव में प्रतिभागी के रूप में किसी भी स्तर की प्रतियोगिता में अध्यापक का सम्मिलित होना, समय के साथ घर करती जड़ता व नीरसता का अंत करता है साथ ही आत्मविश्वास भी उत्पन्न करता है ..
          आज ( 31.03.15) सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत R T E ( The Right of Children to Free and Compulsory Education Act, 2009 ) के परिप्रेक्ष्य में, अध्यापकों की क्विज़ प्रतियोगिता का आयोजन हुआ था जिसमें हमारी टीम ( विजय जयाड़ा, तरुण कुमार व अजय कुमार ) ने प्रथम स्थान प्राप्त किया..


मन की बात ... " साइंस क्विज "




मन की बात ... " साइंस क्विज "

         जब कभी सफलता या सम्मान मिलता है तो उस सफलता के पीछे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े लोग सहसा ही याद आ जाते हैं दूसरे क्षेत्रों में जो कोई भी सफलता मुझे मिली उसका जिक्र उचित समय पर करूँगा फिलहाल आज समाप्त हुए क्षेत्रीय विज्ञान मेले में अध्यापकों की "साइंस क्विज प्रतियोगिता" में हमारी टीम (मैं स्वयं, कु. आरती,कु. प्रिया राणा, श्रीमती राज लक्ष्मी) को प्राप्त दूसरे स्थान के उपलक्ष्य में क्विज में सफलता की बात साझा करने का मन है.
        खेल की पृष्ठभूमि होने से मैदान में दर्शकों का सामना करने मैं मुझे संकोच नहीं होता लेकिन अन्य प्रतियोगिताओं में व मंच से दर्शकों का सामना करने में बहुत संकोच होता था !!
            करीब 10 वर्ष पहले विज्ञान मेले में हमारे विद्यालय की टीम में एक सदस्य की कमी थी मेरी प्रधानाचार्या श्रीमती कमलेश कुमारी जी ने मुझ पर विश्वास कर टीम में शामिल होने को कहा.. लेकिन मेरा संकोच आड़े आ रहा था। मना करना चाहता था लेकिन प्रधानाचार्या जी के विश्वास के चलते या कहिये बड़ों की अवज्ञा न करने के शिष्टाचार के चलते उनकी बात न टाल सका और संकोची मन से प्रतियोगिता में टीम के अन्य साथियों के साथ सम्मिलित हो गया. हमारी टीम अंतिम दौर में पहुँच गयी स्थान सुनिश्चित हो गया लेकिन प्रथम स्थान के लिए दो टीमों के समान अंक होने के कारण अनिर्णय की स्थिति में अंतिम प्रश्न दोनों टीमों के सामने प्रस्तुत किया गया.दूसरी टीम जवाब न दे सकी. मेरी टीम की दूसरी तीन महिला साथियों के पास भी नहीं था. उन्होंने आशान्वित निगाहों से मेरी तरफ देखा !! अब तक मैं झिझक के कारण सिकुड़ रहा था लेकिन छूटते ही मैंने उत्तर दे दिया .. इसी के बाद मेरा आत्मविश्वास चरम पर पहुँच गया ... प्रश्न था .." वोद्का शराब किस से बनायीं जाती है " ... मेरा सही उत्तर सुनकर सारे दर्शक और प्रतिभागी जोर से हंस पड़े ( हंसने का कारण आप समझ ही रहे होंगे !! ) और हम विजेता बन गए !!
             तब से आज तक, क्विज में नौ ( 5 प्रथम, 4 द्वितीय ) पुरस्कार प्राप्त कर चुका हूँ .. जब भी क्विज प्रतियोगिता में स्थान प्राप्त होता है तो उस पुरस्कार को मन से अपनी प्रधानाचार्या श्रीमती कमलेश कुमारी जी को समर्पित करना और साथियों से क्विज में प्रथम प्रविष्टि में उनके योगदान का जिक्र करना कभी नहीं भूलता.
         ये कोई बहुत बड़ी सफलता नही लेकिन यहाँ इन बातों को साझा कर मैं ये कहना चाहता हूँ कि हमें सफलता तक पहुंचने के अवसर कई रूपों में व माध्यमों से मिलते हैं, यदि कोई शुभेच्छु हमें उसका लाभ लेने को प्रेरित या बाध्य करता है तो सम्मान वशात् कहिये या बड़ों की अवज्ञा न करने का शिष्टाचार.. स्वयं के अहम् व संकोच पर विजय प्राप्त कर उत्साह से आगे बढ़ना ही श्रेयस्कर है. हर व्यक्तित्व में अपार सम्भावनाएं निहित होती हैं, प्रेरितकर्ता व शुभेच्छु साथियों का आशीर्वाद, ये तय है कि सदैव हमारी सफलता सुनिश्चित करेगा ..ये मेरा स्वयं का साक्षात् जीवन अनुभव है।
 
 

विद्यालय, संस्कार मंदिर : एक विचार



विद्यालय, संस्कार मंदिर : एक विचार

घर पहुँचने से पहले,
नेक काम कर लिया जाए,
करने तो हैं काम बहुत...
चलो पहले प्यासे पौधों को
पानी पिला लिया जाए ..

......विजय जयाड़ा 
 
            “ बच्चों !! आज छुट्टी का वक़्त हो चला है, अब आप घर जायेंगे, इसलिए बचा हुआ पानी इन पौधों को दे दीजिये. आजकल गर्मियां बहुत हैं इस पानी से ये पौधे, कल तक ताजगी और ठंडक महसूस करते रहेंगे.”
                    बचपन से ही बच्चों में पेड़-पौधों और जंतुओं के प्रति प्रेम और सहिष्णुता का भाव जगाना आवश्यक है. इस कार्य में बिद्यालय का वातावरण महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. विद्यालय केवल किताबी ज्ञान प्रदान करने का या एकत्र सूचनाओं को सम्प्रेषण करने का संस्थान नही बल्कि अच्छे संस्कारों को प्रदान करने व संस्कारों को संवर्धित करने का मंदिर भी है जहाँ अलग-अलग पृष्ठभूमि के बच्चे एक ही स्थान पर प्रतिदिन अपने जीवन का महत्वपूर्ण समय गुजारते हैं. विभिन क्रिया-कलापों के माध्यम से बातों-बातों में, बच्चों में अच्छे संस्कारों का हस्तांतरण व पुष्टिकरण किया जा सकता है ...इस कार्य के लिए किसी विशेष कक्षा या पीरियड की आवश्यकता भी नही ..


खुदी को कर कर बुलंद इतना ..... !! सलाम .....प्रोफ़ेसर देसाई साहब




 

                                 खुदी को कर कर बुलंद इतना ..... !! 

                                            सलाम .....प्रोफ़ेसर देसाई साहब



                 हम बातें तो बहुत बड़ी-बड़ी कर लेते हैं, दूसरों के कार्यों पर खूब टीका-टिप्पणी कर लेते हैं ..लेकिन...!! स्वयं अपने परिवार तक ही सीमित रह जाते हैं !! . समाज में ऐसे कई प्रेरणादायी व्यक्तित्व हैं जो बिना प्रसिद्धि की चाह में सहज और सहृदय भाव से बिना शोर-गुल व दिखावे के ,समाज को नयी दिशा व दशा प्रदान कर रहे हैं, वे किसी सरकारी सहायता के मोहताज नहीं ..न ही उनको किसी से कोई शिकायत है .. कर्म और सेवा ही उनके जीवन का उद्देश्य है
               51 वर्षीय प्रो. संदीप देसाई, गरीब बच्चों के लिए एक गत्ते का डिब्बा लेकर 'भीख मांगकर' स्कूल बनवाते हैं। ट्रेन के डिब्बे में चढ़कर पहले मराठी में कहते हैं - 'विद्या दान सर्वश्रेष्ठ दान आहे। हा दान द्या आणि निर्धन बालकांची मदद करा।' फिर इसी बात को हिंदी और अंग्रेजी में दोहराते हैं ..
                  फिर विस्तार से कहते हैं , 'आप सब पढ़े-लिखे हैं। पढ़ाई का महत्व जानते हैं। पर बहुत से बच्चों के पास पढ़ने की सुविधा और साधन नहीं है। न ही कभी हो सकते हैं। उन्हें पढ़ने में आप मदद कर सकते हैं। आप समर्थ हैं सर, इसलिए आपको यह नेक काम करना ही चाहिए।'ये हैं प्रोफेसर संदीप देसाई। चमत्कृत कर देने वाली शैली में तीन-चार मिनट बोलकर, सबके आगे डिब्बा घुमाना शुरू कर देते हैं । एक रुपये के सिक्के से लेकर 100 रुपये के नोट तक उस डिब्बे में गिरने लगे। हर यात्री द्वारा डिब्बे में कुछ डालने के बाद देसाई अपनी दाईं हथेली अपने दिल पर रखकर थोड़ा झुकते और मुस्कराकर कहते, 'थैंक यू सर, गॉड ब्लैस यू.'दो स्टेशन के बाद वे फिर अगले डिब्बे में चढ़ जाते हैं । कुछ यात्री उनकी प्रशंसा के पुल बांधने लगते हैं । एक युवक कहता है , 'ये अंकल जब भी ट्रेन में मिलते हैं, तो मैं अपनी पॉकेट मनी से बचाये 50 रुपये इन्हें दे देता हूं।'
यात्रियों में कई प्रो.देसाई को जानते थे. वे गोरेगांव में रहते हैं। पेशे से इंजिनियर हैं। एस. पी. जैन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड रिसर्च में प्रोफेसर थे। 1997 में वहां से नौकरी छोड़कर अंग्रेजी माध्यम के एक स्कूल में पढ़ाने लगे। इसमें गोरेगांव की झोपड़ियों के बच्चे पढ़ते थे। वहां पढ़ाते हुए उन्हें महसूस हुआ कि ये बच्चे तो फिर भी पढ़ पा रहे हैं, कितने ही बच्चे पढ़ाई कर ही नहीं पाते। आसपास कोई स्कूल न होने के कारण। बस, उसी दिन से उन्होंने ऐसी जगहों पर स्कूल बनाने की ठान ली। रोजी के लिए ये इधर-उधर कुछ काम करते रहे। 2005 में उन्होंने झोपड़पट्टी के बच्चों के लिए 'श्लोक' स्कूल बनाया। फिर रत्नागिरी में गरीब ग्रामीण के लिए एक स्कूल बनाया। जब उसमें पैसे की कमी आयी, तो उन्होंने ट्रेन में भीख मांगना शरू कर दिया।
             वे छह घंटे गोरेगांव से चर्चगेट तक लोकल ट्रेन में सफर करके भीख मांगने लगे। इस तरह वे 3000 रुपये रोज इकट्ठे करने लगे। पांच महीने में उन्होंने चार लाख रुपये एकत्र कर लिए। अगले चार महीने में दूसरा स्कूल भी शुरू हो गया। देसाई वहीं नहीं रुके। उनकी योजना ऐसे दर्जनों स्कूल बनाने की है। इसलिए वे आज भी रोज ट्रेनों में भीख मांगते हैं। रोज जितना पैसा मिलता है, रात को उसका हिसाब लिखकर सोते हैं और अगली सुबह पैसा बैंक में जमा कर देते हैं। अभी उन्हें दर्जनों स्कूल जो बनवाने हैं।
               अभिनेता सलमान खान ने एक दिन ट्विटर पर प्रोफेसर देसाई को सलाम किया। फिर सलमान ने उन्हें फोन करके उनसे उनका बैंक एकाउंट नंबर लिया। उनसे वादा भी लिया कि मैं आपकी मदद करूंगा, पर आप किसी को बताना मत। इसलिए वे सलमान द्वारा दी गई रकम के बारे में नहीं बताते। दरअसल प्रो. देसाई की मां एक ग्रामीण स्कूल में अध्यापिका थीं। देसाई ने बचपन से देखा था कि किस तरह गरीब बच्चे पढ़ नहीं पाते। तभी उन्होंने ऐसे बच्चों के लिए कुछ करने का संकल्प किया था। वह संकल्प आज वे पूरे तन-मन-धन से निभा रहे हैं।ज्ञान की ज्योति ऐसे ही जलती है... आपके इस समर्पण युक्त ज़ज्बे को .. ... सलाम .....प्रो, देसाई साहब
 
 
 

Saturday, 19 March 2016

इजाजद हो गर नफरत की



इजाजद हो
गर नफरत की
  तो वो मजहब नहीं !
इंसानियत से भी
       जरूरी हो ___
   कोई मजहबी किताब नहीं !!

.. विजय जयाड़ा