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Friday, 9 September 2016

यादें ... जब हम हार के बावजूद भी जीत गए ..



यादें ... जब हम हार के बावजूद भी जीत गए ..

       बात 1989 की है उस सत्र में मैं पी. जी. कॉलेज उत्तरकाशी क्रिकेट टीम का कप्तान था. स्थानीय टूर्नामेंट का सेमी फाइनल मैच चल रहा था. मैं टीम का उद्घाटक बल्लेबाज हुआ करता था. प्रतिद्वंदी टीम ने उत्तरकाशी से बाहर के खिलाडी बुलाकर अपनी टीम को मजबूत कर दिया था.
       अम्पायर के कुछ गलत निर्णयों के कारण हमारे चार विकेट गिर गए.जिससे हमारी स्थिति कमजोर होने लगी ! बल्लेबाजी के एक सिरे को मैं थामे हुए था. हद तब हो गयी जब पांचवे विकेट के रूप में अम्पायर ने मुझे भी गलत निर्णय देकर आउट करार दे दिया. इस तरह बची-खुची आस भी समाप्त हो गयी ! तब मैं बहुत शांत और संकोची स्वभाव का हुआ करता था लेकिन पहली बार अम्पायर के निर्णय से मेरे असंतोष जताने पर, पहले से ही असंतुष्ट दर्शकों की भावना को बल मिल गया जिससे अम्पायरों और आयोजकों के प्रति उनका रोष अब आक्रोश में बदल गया.
        सारे दर्शक क्रुद्ध होकर मैदान में आ धमके !! मैच रुक गया !! अब ये स्थिति मेरे लिए धर्मसंकट की स्थिति थी ! क्योंकि खिलाडी होने के साथ-साथ मैं टीम का कप्तान भी था !! मानवीय भावनाओं के सैलाब में किसी भी स्थिति में खेल भावना को बचाए रखना मेरा दायित्व था.
        मेरी टीम और दर्शक, मैदान में अम्पायर के निर्णयों के विरोध में डटे हुए थे. टीम अम्पायर के निर्णयों पर पुनर्विचार किये बिना आगे खेलने को तैयार ही न थी..
        सभी इस बात पर अड़े थे की अम्पायर बदले जाएँ और मैच पुन: नए सिरे से प्रारंभ किया जाय. मैंने बेकाबू होती स्थिति की गंभीरता को देखते हुए आयोजकों से उस दिन शेष मैच स्थगित कर देने आग्रह किया.. दो दिन बाद, नए सिरे से नहीं ! बल्कि जहाँ मैच रोक दिया गया था उसी स्थिति से उन्हीं अम्पायरों के साथ शुरू करवाने पर सबको राजी किया.
        बेशक ! प्रतिष्ठा के विपरीत गलत निर्णयों के चलते हम सेमी फाइनल मैच हार गए लेकिन खेल भावना और खेल की आत्मा जीवित रही. इस कारण ये मैच आज भी मेरी स्मृतियों में ज्यों का त्यों सुरक्षित है।



Friday, 19 August 2016

अपना हाथ जगन्नाथ ...



अपना हाथ जगन्नाथ ...

         स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर विद्यालय स्तर पर बच्चों की दौड़-कूद प्रतियोगिताएं आयोजित की जानी हैं. कूद प्रतियोगिता के लिए लिए बच्चों के चयन के लिए मैदान बनना था, भरान में ईंट और पत्थर के बड़े-बड़े टुकड़ों के कारण मैदान काफी सख्त और पथरीला है. जिसे इस उमस भरी गर्मी में खोद पाना आसान काम न था. मजदूर ने कुछ समय बाद आने को कहकर निराश कर दिया !
      मुझे बच्चों का चयन करना था, “ अपना हाथ जगन्नाथ !! " .. अत: फावड़ा लिया और स्वयं ही खोदने लगा, मुझे अकेला खुदाई करता देख कर साथी अध्यापिका ने भी हाथ बंटाना शुरू कर दिया.. अब एक से भले दो !! जब मजदूर आया तब तक हम कूद के लिए वांछित तीन चौथाई क्षेत्र खोद चुके थे. अत: अब उसकी आवश्यकता न थी.
      अभ्यस्त न होने के कारण भले ही हम दोनों के हाथों में छाले आ गए थे लेकिन अपने अनुसार बच्चों के लिए कंकड़-पत्थर रहित सुरक्षित कूद का स्थान बना कर हमें संतोष था और अब हमारे पास बच्चों के चयन के लिए पर्याप्त वक्त भी शेष था.


Thursday, 4 August 2016

गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर:,




गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर:,
 
                                               गुरु साक्षात् परमं ब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम:।
 
             आज का दिन मेरे भू लोक प्रवास हेतु तय अवधि के अंतर्गत एक और वर्ष पूर्ण होने का दिन था ! आत्मचिंतन का दिन था !!
              सोचा ! मौका भी है और दस्तूर भी ! अतः क्यों न बच्चों के साथ मिलकर धरती का श्रृंगार किया जाय..तस्वीर की पृष्ठभूमि में दिख रहे घने नीम को भी कुछ वर्ष पहले इसी तरह रोपित किया था. समय तो पंख लगाकर उड़ता चला गया ! लेकिन इस दौरान नन्हा नीम, दरख़्त रूप धारण चुका है. और भी कई पेड़ हैं जो अब वयस्क हो चुके हैं.
             नीम की छाँव में बच्चों को खेलते हुए देखता हूँ तो आत्मिक आनंद प्राप्त होता है और फिर बरबस ही बाल कविता फूट पड़ती हैं..


.......... नीम .........
 सुबह सवेरे सबसे पहले
हमको दिखता प्यारा नीम
सुबह सुबह स्कूल में पहुंची
सो रहा था प्यारा नीम
मैंने उस पर पानी डाला
झट से जागा प्यारा नीम
सरसर सरसर पतियाँ हिलाता
हंसकर बैठा प्यारा नीम
सब बच्चे खुश होकर बोले
हमको भाता प्यारा नीम
आओ मिलकर वृक्ष लगायें
रोग भगाता प्यारा नीम
 
.. विजय जयाड़ा

वंश





               बागवानी भूमि क्षेत्र के अनुपात में बागवानी विभाग में नियुक्त मालियों की संख्या कम होने से कई बार फोन करने के बावजूद आज भी माली बचे शेष पौधे लगाने नहीं पहुँच सके.
              सोचा ! अपना हाथ.. जगन्नाथ !! कहीं परसों के बाकी बचे पांच पेड़, रखे-रखे सूख न जाएँ इसलिए स्वयं ही मध्यावकाश समय का उपयोग कर रोपित कर दिए लेकिन तभी देखता हूँ कि बच्चों के अलग-अलग समूह, रोपे गए पौधों के ट्री गार्ड्स पर कागज की चिट बाँध रहे हैं !!
जिज्ञासा में एक ट्री गार्ड के पास खड़े बच्चों से पूछा “ बेटा ! ये क्या कर रहे हो ! “
             बच्चों से जवाब मिला, “ सर जी ! अब ये पेड़ हमारा है हम इसको पानी देंगे और देखभाल करेंगे.” .
              मेरे प्रसन्नता मिश्रित विस्मय का ठिकाना न रहा !! आगे बढ़कर चिट को पढ़ा... उस पर तीनों बच्चों के नाम लिखे थे .. छाया, कनिष्का, मानसी, कक्षा- चतुर्थ ‘ ब ’, बच्चों ने इस पौधे को “ वंश “ नाम देकर नामकरण भी कर दिया गया था ! संस्कारवान शिक्षा प्रदान करने हेतु इन बच्चों की अध्यापिका कुमारी रानी, (Riya Soni) निश्चित ही बधाई की पात्र हैं.
               पौधों की देखभाल में बच्चों का सहयोग अवश्य लेता हूँ लेकिन ईमानदारी से बताता चाहूँगा कि इस सम्बन्ध में मैंने बच्चों का मार्गदर्शन नहीं किया था. यदि छोटे-छोटे बच्चे स्वयं ही सार्थक पहल कर रहे हैं तो मान लिया जाना चाहिए कि बच्चे, निश्चित ही विद्यालय में होने वाली गतिविधियों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कुछ सीख रहे हैं ..
               इस मौसम में वृक्षारोपण कोई नया विषय नहीं ! लेकिन बच्चों में पर्यावरण मित्र होने के संस्कार घर कर जाना मेरे लिए कौतूहल व प्रसन्नता विषय है !!



Saturday, 16 July 2016

पावस



पावस

घुमड़ - घुमड़ घन नभ में छाए
कड़-कड़-कड़ बिजली संग लाए
  दिन में हो गया घुप्प अँधेरा !
देख - देख जी सबका घबराए.
अब बरसे तब बरसे बादल
लहर-लहर नभ हिचकोले खाए
देखो उधर से आई बारिश
दौड़-दौड़ सब छत नीचे आए.
झम-झम झम बारिश आई
फुदक - फुदक दादुर टर्राएं
   पावस आयो ! पावस आयो !!
झूम-झूम सब मिलकर गाएं.
इंद्र धनुष की छटा निराली
वन मयूर नाचे इतराएं
बरसे मेघा सावन आया
  बच्चे कागज नाव चलाएं..

विजय जयाड़ा 16.07.16

           आज सुबह घने बादलों के कारण अँधेरे और बारिश का दौर चल रहा था. कक्षा में बच्चे बहुत कम आये. सामान्य पठन-पाठन के बाद सोचा ! क्यों न बच्चों के साथ खेल-खेल में मौसम के अनुकूल कुछ सृजन किया जाय.. अध्यापक की चित्त संतुष्टि व प्रसन्नता शिक्षार्थियों में निहित प्रतिभा विकास में ही होती है.
           भाषा विकास के क्रम में बच्चों के शब्द कोष मे चंद नए शब्दो, पावस, जी, घन, मेघ, हिचकोले, नभ, दादुर, मयूर, छटा का इजाफा करने की चाहत में एक प्रयास .. " पावस "

हो उजास जीवन निरंतर




हो उजास जीवन निरंतर
तन भी व्याधि मुक्त हो
मरु अगर हो जाए धरा तो
      आप उपवन मध्य हो ... 2

खार मुक्त हो पथ स्वयं
ठोकर न लगने पाए कहीं
शतायु हो जीवन सफल
       कामना मेरे मन की यही ... 2

दिवस उत्सव पूर्ण हो नित
सकल मनोरथ सिद्ध हो
अंगना बरसे खुशियाँ निस दिन
       घर धन – धान्य पूर्ण हो .... 2
.. विजय जयाड़ा 15.07.2016
       आज, बीज को वट वृक्ष का रूप दे सकने का हुनर रखने वाली, कुशल मार्गदर्शी व प्रेरक व्यक्तित्व, हमारे विद्यालय की प्रधानाचार्या, श्रीमती कमलेश कुमारी जी का सेवाकाल के अंतर्गत विद्यालय परिवार के मध्य मनाया जाना वाला अंतिम जन्म दिवस था.
      आदरणीया श्रीमती कमलेश जी के बारे में संक्षिप्त में इतना ही कहूँगा कि मेरे व्यक्तिव में बहुत कमियाँ है लेकिन अगर आपको कुछ अच्छा जान पड़ता है तो उसका काफी कुछ श्रेय मैं नि:संकोच आदरणीया श्रीमती कमलेश जी को देना चाहूँगा.
      ऐसे प्रेरक व विद्वान् व्यक्तित्व को भला व्यक्तिगत रूप से मैं उपहार में क्या दे सकता था.! मैनें मनोद्गारों को त्वरित चंद पंक्तियों में पिरोकर भेंट करना ही उचित समझा ..

Wednesday, 6 July 2016

क्या हुआ गर मिट गये अपने वतन के वास्ते।



क्या हुआ गर मिट गये अपने वतन के वास्ते।
बुलबुलें कुर्बान होती हैं चमन के वास्ते॥
......पंडित राम प्रसाद बिस्मिल
 
       आज सुबह नहाकर जब घर से बाहर पार्क की रेलिंग पर गीला तौलिया फैला रहा था तो स्वतंत्रता संग्राम में देशभक्ति का जज्बा उत्पन्न करने वाली कई गजलों में पंडित राम प्रसाद बिस्मिल द्वारा प्रतीक रूप में प्रयोग किये गए ' बुलबुल ' के जोड़े और उनके बच्चे को घर के सामने लगाये गए पेड़ों में फैली मधुमालती की बेल के झुरमुट में छिपा देखा..
      दोपहर स्कूल से घर आया तो बच्चा वहीँ बैठा था .. शाम को देखा फिर वहीँ !!
      इस दौरान नर और मादा बुलबुल बारी-बारी उसके लिए दाना लेकर आते तो शान्त बैठा बच्चा खुशी में बहुत तेज पंख फड़-फड़ाते हुए चैं-चैं करके ख़ुशी का इज़हार करता. ममता, वात्सल्य और अनुशासन का अनुपम नजारा देखते ही बनता था.
       इस दौरान मैं बाहर निकलकर देखता तो डरने की बजाय बुलबुल फुर्र से करीब आकर पार्क की रेलिंग पर बैठकर मुझसे मुखातिब होकर चिंचियाकर अपनी बोळी में कुछ कहती .. शायद कहती होगी !!.. " मेरे बच्चे का ख्याल रखना !! " पत्नी ने बताया खिड़की में एक कौवा, बच्चे के शिकार की टोह में बैठा रहता है.. यह क्रम दिन भर लगभग बारह घंटे चला. शाम को कब बुलबुल जोड़ा अपने बच्चे को उड़ाकर ले गया ! पता न चला !! मुझे पूरा यकीन है कि कल फिर बुलबुल का जोड़ा इसी सुरक्षित जगह अपने बच्चे को लेकर आयेंगा.
       बुलबुल का बच्चा दिन भर एक ही जगह पूर्ण अनुशासन में बैठा रहा ! नींद आती तो वहीँ सो जाता लेकिन इधर-उधर जाने की जरा भी कोशिश न करता , इस पक्षी अनुशासन पर आश्चर्य हुआ !!
जब इस फ़्लैट पर आया था तो पार्क में मात्र एक छोटा सा कीकर का पेड़ था उसी की छाया में बैठकर काम करवाया. उसके बाद पूरे पार्क में सबने मिलकर खूब पेड़ लगाये. अब आलम ये है कि किसी पक्षी विहार की तरह अलग-अलग मौसम में रंग-बिरंगे पक्षी यहाँ आकर अपना बसेरा बना लेते हैं. जिनको देखना एक अलग ही आनंद देता है.
       कंक्रीट के बढ़ते जंगलों के बीच पक्षियों के आसरे के लिए प्राकृतिक वातावरण अर्थात पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण करना वक्त का तकाजा है. अत: वृक्षारोपण जरूरी है तभी हम स्वयं को प्रकृति के बीच पा सकते हैं..साथ ही बच्चों को प्रकृति मित्र होने के संस्कार भी दे पाएंगे.. कहीं ऐसा न हो कि पक्षियों के प्रति हमारी संवेदनहीनता के कारण आने वाली पीढ़ी के लिए ये पक्षी, कहानी और किस्सों का पात्र बन कर यादों और कल्पनाओं में ही सिमट कर न रह जाएँ !!
कैमरा बेटी के पास ऋषिकेश में होने के कारण बुलबुल परिवार की दिनचर्या की तस्वीर न ले सका ...
तस्वीर साभार :गूगल